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लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा में ‘भयावह बढ़ोतरी’ चिंता का सबब  
April 6, 2020 • Rashtra Times

विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 पर काबू पाने के प्रयासों के तहत दुनिया के कई देशों में तालाबंदी लागू होने से विश्व आबादी का एक बड़ा हिस्सा घरों तक सीमित हो गया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इन हालात में महिलाओं व लड़कियों के प्रति घरेलू हिंसा के मामलों में ‘भयावह बढ़ोत्तरी’ दर्ज किए जाने पर चिंता जताते हुए सरकारों से ठोस कार्रवाई का आहवान किया है। 
अपने संदेश में यूएन महासचिव ने ध्यान दिलाया है कि हिंसा महज रणक्षेत्र तक ही सीमित नहीं है और “कई महिलाओं व लड़कियों के लिए खतरा सबसे ज्यादा खतरा तब होता है जब उन्हें सबसे सुरक्षित होना चाहिए: उनके अपने घरों में।” 

गौरतलब है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने वैश्विक युद्धविराम की एक अपील जारी की थी ताकि साझा प्रयासों को कोरोनावायरस की चुनौती से निपटने पर केंद्रित किया जा सके। 

महामारी के कारण उपजी आर्थिक व सामाजिक चुनौतियों और आवाजाही पर पाबंदी लगने से लगभग सभी देशों में महिलाओं व लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार के मामलों में भारी वृद्धि दर्ज की गई है।

हालांकि कोरोनावायरस के फैलाव से पहले भी आंकड़े स्पष्टता से इस समस्या को बयां करते रहे हैं। दुनिया भर में करीब एक-तिहाई महिलाएं अपने जीवन में किसी ना किसी रूप में हिंसा का अनुभव करती हैं। यह मुद्दा विकसित और निर्धन, दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है।

अमेरिका में कॉलेज जाने वाली लगभग एक-चौथाई महिला छात्रों ने यौन हमले या दुराचार का सामना किया है, जबकि सब-सहारा अफ्रीका के कुछ हिस्सों में संगी-साथी द्वारा की जाने वाली हिंसा 65 फीसदी महिलाओं के लिए एक सच्चाई है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का विश्लेषण दर्शाता है कि महिलाओं के शारीरिक, यौन, प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य पर हिंसा का गहरा असर पड़ता है। शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव करने वाली महिलाओं का गर्भपात होने या उनके मानसिक अवसाद में घिरने की आशंका दोगुनी हो जाती है। 

कुछ क्षेत्रों में हिंसा का शिकार महिलाओं के एचआईवी संक्रमित होने की आशंका 1.5 गुना ज्यादा होती है। तथ्य दर्शाते हैं कि यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं को शराब की लत होने की आशंका 2.3 गुना अधिक होती है। 

वर्ष 2017 में 87 हजार से ज्यादा महिलाओं की इरादतन हत्या की गई जिनमें आधे से ज्यादा महिलाओं की मौत के लिए उनका साथी या कोई पारिवारिक सदस्य जिम्मेदार था। 

स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक कोविड-19 महामारी के शुरू होने के बाद से लेबनान और मलयेशिया में “हेल्पलाइन’ पर आने वाली फोन कॉल की संख्या दोगुनी हो गई है जबकि चीन में यह संख्या तीन गुनी हुई है।

ऑस्ट्रेलिया में गूगल जैसे सर्च इंजनों पर घरेलू हिंसा संबंधी मदद के लिए पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा जानकारी इन दिनों खोजी जा रही है। ये आंकड़े समस्या के स्तर को दर्शाते हैं लेकिन इनसे सिर्फ उन्हीं देशों के बारे में जानकारी मिलती है जहां रिपोर्टिंग प्रणाली पहले से स्थापित है।

कमजोर संस्थागत ढांचों वाले देशों में वायरस के फैलने की स्थिति में शायद पर्याप्त जानकारी और डेटा उपलब्ध ना हो पाए। आशंका जताई गई है कि ऐसे स्थानों पर महिलाओं व लड़कियों के घरेलू हिंसा के शिकार होने का जोखिम भी ज्यादा है। 

कोरोनावायरस के फैलने से स्वास्थ्य सेवाओं पर भार अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा है। ऐसे में घरेलू हिंसा की घटनाओं से निपटने में सबसे बड़ी चुनौती संस्थाओं का बोझ तले दबा होना है। 

“स्वास्थ्य सेवा प्रदाता और पुलिस बल भारी बोझ में हैं और स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं। मदद प्रदान करने वाले स्थानीय समूह भी बेबस हैं या फिर उनके पास फंड की कमी है। घरेलू हिंसा पीड़ितों के लिए कुछ शरणगाह बंद हो गई हैं; अन्य स्थानों पर जगह नहीं बची है।”

यूएन महासचिव ने सभी सरकारों से आग्रह किया है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा की रोकथाम और उसके निवारण के उपायों को कोविड-19 से निपटने की राष्ट्रीय योजनाओं का अहम हिस्सा बनाना होगा।

“कोविड-19 से लड़ाई के दौरान, हम एक साथ मिलकर हिंसा की हम रोकथाम कर सकते हैं और ऐसा करना होगा, युद्धक्षेत्र से लेकर लोगों के घरों तक।”