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इस रहस्यमयी वस्तु के बारे में बताया गया कि रॉकेट लांचर की इस्तेमाल की जा चुकी ईंधन की टंकी हो सकती है। राजस्व एवं आपदा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि रहस्यमयी वस्तु पीएसएलवी रॉकेट लांचर की इस्तेमाल की जा चुकी ईंधन की टंकी जैसी दिखाई देती है। अधिकारी ने कहा कि हमने श्रीहरिकोटा में इसरो को इसके बारे में बताया है और इसका पूरा विवरण इकट्‍ठा किया जा रहा है। इसकी लंबाई 13.5 मीटर है और इस पर एफएम 199 22/03/2019 लिखा हुआ है।
December 3, 2019 • Rashtra Times

Chandrayaan-2 के दुर्घटनास्थल विक्रम लैंडर के मलबे की तस्वीरें अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) ने ट्‍विटर पर पोस्ट की। ऑर्बिटिंग कैमरा से चंद्रमा की तस्वीरों का निरीक्षण करने के बाद नासा ने कहा कि उसे भारतीय चंद्रयान-2 विक्रम लैंडर के दुर्घटना स्थल का पता चला है और मलबा भी मिला, लेकिन असल में नासा नहीं बल्कि चेन्नई के एक भारतीय इंजीनियर ने विक्रम लैंडर के मलबे को खोजा। शनमुगा सुब्रमण्यम नाम के इस इंजीनियर ने खुद लूनर रिकनाइसांस ऑर्बिटल कैमरा (एलआरओसी) से तस्वीरें डाउनलोड कीं। इसकी पुष्टि खुद नासा और एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी ने की।अंतरिक्ष विज्ञान में दिलचस्पी रखने वाले सुब्रमण्यम ने वह कमाल किया जिसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियां और वैज्ञानिक भी नहीं कर सके। सुब्रमण्यम ने उस मलबे का पता किया और वैज्ञानिकों की वह जगह खोजने में सहायता की, जहां विक्रम लैंडर क्रैश हुआ था।नासा ने अपने बयान में कहा कि शनमुगा ने सबसे पहले मैन क्रैश साइट से लगभग 750 मीटर उत्तर पश्चिम में मलबा देखा। विक्रम लैंडर की 7 सितंबर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने की भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की कोशिश नाकाम रही थी और लैंडिंग से कुछ मिनट पहले लैंडर का इसरो से संपर्क टूट गया था। नासा ने अपने 'लूनर रिकॉनसन्स ऑर्बिटर' (एलआरओ) से ली गई तस्वीर में अंतरिक्ष यान से प्रभावित स्थल को और उस स्थान को दिखाया है जहां मलबा हो सकता है। लैंडर के हिस्से कई किलोमीटर तक लगभग दो दर्जन स्थानों पर बिखरे हुए हैं।नासा ने कहा कि उसने स्थल की एक तस्वीर 26 सितंबर को शेयर की और लोगों से उस तस्वीर में लैंडर के मलबे को पहचानने के लिए लोगों से आग्रह किया। नासा ने कहा कि शनमुगा सुब्रमण्यन ने एलआरओ परियोजना से संपर्क किया और मुख्य दुर्घटनास्थल से लगभग 750 मीटर उत्तर पश्चिम में पहले टुकड़े की पहचान की।अमेरिकी एजेंसी ने कहा कि यह जानकारी मिलने के बाद, एलआरओसी दल ने पहले की और बाद की तस्वीरें मिलाकर इसकी पुष्टि की। पहले की तस्वीरें जब मिलीं थी तब खराब रोशनी के कारण प्रभावित स्थल की आसानी से पहचान नहीं हो पाई थी।नासा ने कहा कि इसके बाद 14 -15 अक्टूबर और 11 नवम्बर को दो तस्वीरें हासिल की गईं। एलआरओसी दल ने इसके आसपास के इलाके में छानबीन की और उसे प्रभावित स्थल (70.8810 डिग्री दक्षिण, 22.7840 डिग्री पूर्व) तथा मलबा मिला।नासा के अनुसार नवंबर में मिली तस्वीर के पिक्सल (0.7 मीटर) और रोशनी (72 डिग्री इंसीडेंस एंगल) सबसे बेहतर थी। भारत का यह अभियान सफल हो जाता तो वह अमेरिका, रूस और चीन के बाद चांद पर पहुंचने वाला चौथा देश बन जाता।